"गुरु-गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय,
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाये"
कबीरदास का यह प्रसिद्ध दोहा गुरु की महिमा उनकी प्रतिष्ठा को सर्वोपरि मानते हुए कहते है कि सच्चा गुरु ही भगवान तुल्य है उनके प्रति समर्पित जीवन ही हमें ज्ञान, जीवन दर्शन के पथ पर चलते हुए ईश्वर की भक्ति की ओर ले जाता है। गुरु शिष्य परम्परा की खूबसूरती इसी में छुपी है। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा हजारों वर्षों से सभी धर्मों जैसे हिन्दू, जैन, सिख और बौद्ध परंपराओं की रीढ़ की हड्डी रही।
सभी धर्मों ने 'गुरु शिष्य' की परम्पराओं और व्यवस्थाओं के महत्व को स्वीकार करके रेखांकित किया हुआ है। भारत में ज्ञान और शिक्षा आदिकाल से ऋषि-मुनियों या संतों द्वारा दी गई 'गुरु शिष्य' परम्परा पर आधारित थी। जो देश की संस्कृति का अहम हिस्सा और इस परम्परा की कीर्ति भूमिका का वर्णन हमारे शास्त्रों में मिलता है।
"गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष,
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटें न दोष"
अर्थात बिना गुरु के ज्ञान, मोक्ष रूपी मार्ग, सत्य और आत्मबोध की प्राप्ति असंभव है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली का आधार गुरु-शिष्य संबंध ही था। गुरु ही शिष्यों को सत्य एवं असत्य का ज्ञान प्राप्त कराने में निपुण है।
विश्वामित्र, परशुराम, द्रोणाचार्य और रामकृष्ण परमहंस जैसे महान गुरुओं ने अपने शिष्यों — राम, कृष्ण, अर्जुन और विवेकानंद को न केवल शिक्षा दी बल्कि जीवन के गहनता के दर्शन भी कराए। कबीर जी स्वयं रामानंद के शिष्य थे। यही परंपरा भारत की सांस्कृतिक धरोहर और आध्यात्मिक शक्ति का आधार है।
डिजिटल युग में गुरु और शिक्षक का… बदलता स्वरूप
भारत के इतिहास में पांच सितम्बर (टीचर्स डे) का खास महत्व है। यह दिन देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षक, महान दार्शनिक और आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उन्हीं के सम्मान में इस खास दिन को भारत में 'शिक्षकों को समर्पित' दिवस घोषित किया गया है।
आज ऑनलाइन गुरुओं के कारण शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप में बदलाव आ गया है… गुरुकुलों की घटती संख्या ने आधुनिकतम तकनीकी से परिपूर्ण स्कूलों और विश्वविद्यालयों का डंका बज रहा है। इंटरनेट पर उपलब्ध सुविधाओं ने ज्ञान प्राप्त करने में व्यापक विस्तार हुआ है।
कोरोना महामारी इसका सजीव उदाहरण है। उस दौरान भी शिक्षकों ने समाज और छात्रों के प्रति अपना दायित्व बखूबी निभाई। 'डिजिटल माध्यम' खोज व सूचना का बेजोड़ उपकरण के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में नींव का पत्थर साबित हुआ।
आज 'गूगल गुरु' ने युवाओं के जीवन पर एक तरह से शारीरिक और मानसिक रूप से कब्जा ही कर लिया है। फिर भी तकनीक चाहे जितनी उन्नत हो जाए, शिक्षक की भूमिका कभी कम नहीं हो सकती।
गुरुओं के मूल उपदेशों को न भूलें — भौतिकता को जीवन का आधार न बनने दे। चरित्रवान और निष्ठावान बने रहे। आध्यात्मिक ज्ञान और योग साधना को अपनी जीवनशैली में अपनाने में कंजूसी न करें। गुरुओं के प्रति सच्ची भक्ति का सार यही।
शिक्षक दिवस पर नमन !
— गीतांजलि सक्सेना, सितम्बर २०२५