प्रवासी मन

नज़राना परदेश से

प्रवासी मन
नज़राना परदेश से
परदेस में बसे हैं, पर देस नहीं भूला,
हर साँस में बसी है मिट्टी की खुशबू।
दिल्ली की गलियाँ, मुंबई की बारिश,
सब याद आती हैं अबू धाबी में।
तिरंगे को देख आँखें भर आती हैं,
वंदे मातरम सुन रोंगटे खड़े हो जाते।
परदेस में बिताए ये साल लंबे,
पर भारत से नाता कभी न टूटा।
यह नज़राना है परदेश से,
उस देस के नाम जो दिल में बसा।
दूरी तो है, पर प्यार नहीं घटा,
हर दिल की धड़कन में भारत जीता।
— गीतांजलि सक्सेना, जुलाई २०२२
विषय: प्रवासी मन हिंदी साहित्य गीतांजलि सक्सेना
← पिछली रचनाHealth is Wealth अगली रचना →नारीत्व